Russia Ukraine War: क्या है जर्मनी में बढ़ती तेल कीमतों का खेल


दुरूस यूक्रेन युद्ध (Russia Ukraine War) के शुरू होने से पहले ही दुनिया भर में तेल की कीमतों (Oil Prices) में उछाल आने लगा था. पश्चिमी देश रूस पर पाबंदियां लगाने की बात करने लगे थे और इसका सीधा असर यूरोप में तेल और गैस की आपूर्ति पर होना भी तय माना जाने लगा था.  और फिर हुआ भी यही. युद्ध शुरू होने के बाद से प्रतिबंधों का खेल चला. जैसी आशंका थी, रूस से तेल और गैस की यूरोप में आपूर्ति प्रभावित हुए और दाम बढ़ने लगे. इसमें सबसे ज्यादा प्रभावित जर्मनी (Germany) हुआ क्योंकि जर्मनी रूस से सबसे ज्यादा तेल लेता है.

अनिश्चितता किस बात की
जर्मनी के  पेट्रोल पंपो पर वाहन चालकों को एक लीटर पेट्रोल की कीमत 2.13 यूरो प्रति लीटर और डीजल पर 2.25 यूरो प्रति लीटर देनी पड़ रही है. ऐसा सरकारी सब्सडी देने के बाद भी हो रहा है. डीयू की रिपोर्ट में कील इंस्टीट्यूट ऑफ वर्ल्ड इकोनॉमी के जेन्स बोयसेन-होग्रेफ ने बता कि आने वाले कुछ दिनों और हफ्तों तक तेल की उपलब्ध मात्रा को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है.

कीमतों में उतार चढ़ाव
जेन्स का कहना है कि यही वजह है कि सप्लायर्स अभी बढ़ी कीमतों पर तेल जमा करने पर मजबूर हैं. इसी वजह से तेल की कीमतें बढ़ रही हैं फिर भी ऐसा लगता है कि कुछ गड़बड़ है. युद्ध शुरू होने से पहले ब्रेंट क्रूड तेल की कीमत 85 यूरो प्रति बैरल थी और उसके एक सप्ताह बाद यह 115 यूरो तक पहुंच गई. 17 मार्च को बैरल की कीमत 96 यूरो थी. यानि युद्ध से पहले लीटर के लिहाज से केवल 0.003 यूरो का अंतर रह गया था.

दामों में अंतर की पहेली
इसी बीच तेल की कीमतें पेट्रोल और गैस पंपों तक झटके पहुंचाते रहे जहां डीजल 2.25 यूरो प्रति लीटर रहा जो एक सप्ताह पहले से 0.55 यूरो ज्यादा था. ऐसे में सवाल यही है कि यह गणित इतना गड़बड़ कैसे हो गाय और क्रूड तेल और पंपों की कीमतों में अंतर का पैसा किसके पास जा रहा है.

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रूस यूक्रेन युद्ध का सबसे ज्यादा नुकसान यूरोप (Europe) को ही हो रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Shutterstock)

किसमें बटता है पैसा
वाहन चालक पेट्रोल डीजल या गैस के लिए जो पैसा चुकाते हैं, वह कई लोगों में बटता है. जिसमें तेल कंपनियां, स्पलायर, रीफायनरी, गैस पंप और देश की सरकार शामिल हैं. उत्पाद की वास्तविक कीम  बिकाऊ कीमत की आधी ही होती है. इसमें कच्चे तेल को हासिल करने के साथ तेल की आवागमन की कीमत, और ज्यादा प्रसंस्करण, कमी, प्रशासन और वितरण की लागत शामिल होती है. इसके ऊपर से CO2 के टैक्स साथ कंपनियों का मुनाफा भी शामिल होता है.

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और सरकारी टैक्स?
इसके अलावा सरकारी टैक्स का भी एक हिस्सा होता है जर्मनी में तेल के बिल में डीजल का 39 प्रतिशत और पेट्रोलका 48 प्रतिशत हिस्सा होता है. लेकिन इस बात की संभावना कम ही है कि ऊंची कीमतों का फायदा सरकार को जाता होगा. ऐसा इसलिए है क्योंकि ऊर्जा कर की दर निश्चित है और वह तेल की कीमतों में उतार चढ़ाव से बदलती नहीं है. डीजल के लिए वह 47.04 सेंट्स प्रति लीटर है तो पेट्रोल के लिए 6545 सेंट्स प्रति लीटर है.

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रूस यूक्रेन युद्ध के चलते दुनिया में तेल की कीमतें बढ़ने का फायदा रूस (Russia) को नहीं मिल रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

पंप मालिक की हालत
पेट्रोल पंप के मालिकों को इन बढ़ी हुई कीमतों का फायदा मिलता होगा इसमें संदेह है. बोयसेन होग्रेफ का कहना है कि मार्जन ज्यादा होता नहीं है. उल्टे वे कम तेल बेच पाते हैं इसलिए बढ़ी कीमतों का फायदा पंप मालिकों को नहीं मिल पाता है. वहीं जर्मनी अपने जरूरत का सभी कच्चा तेल और तैयार डीजल का 41 प्रतिशत आयात करता है. तो क्या रूस को इस सब का फायदा होता है?

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यह सच है कि भी बढ़ी हुई कीमतों के लिए रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जिम्मेदार हैं, लेकिन इस बात की संभावना नहीं है कि रूस को बढ़ती कीमतों का फायदा मिले क्योंकि यह समझौते के समय तय हो जाता है कि खरीदे गए तेल की कीमत क्या होगी. ऐसे में केवल रीफायनरी ही बचतीं  हैं. वैसे तो रीफायनरी की भूमिका की जर्मन सरकार ने जांच के आदेश दे दिए हैं. लेकिन ईंधन की कीमतों में इजाफे के और भी कारण हो सकते हैं.


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