Improvement needed in Music Teaching System Padma Vibhushan Vidushi Prabha Atre nodakm – संगीत शिक्षण पद्धति में सुधार ज़रूरी: पद्मविभूषण विदुषी प्रभा अत्रे | – News in Hindi

हिन्दुस्तानी संगीत की सुरम्य परंपरा का ‘प्रभा मंडल’ एक बार फिर जगमग हो उठा है. नए बरस का आगाज़ इससे बेहतर भला क्या होगा! ख़बर मिली कि भारत सरकार के सम्मानों की सूचि में संगीत विदुषी प्रभा अत्रे को पद्विभूषण से अलंकृत करने की सूचना है. ‘ताई’ की तपस्या को मिले इस मान से सांस्कृतिक पर्यावरण में हर्ष है.

किराना घराने की विरासत को अपने कंठ-कौशल से कल्पनाशीलता विस्तार देने वाली प्रभा अपनी स्वरमयी आभा के बीच हमारे वक़्ती दौर का सुरीला विश्वास बनी हुई हैं. नब्बे की आयु में भी उनकी सक्रियता और आंतरिक मनोबल चकित कर देने वाला है. वे अपने गुरू स्वर्गीय सुरेश बाबू माने और हीराबाई बड़ोदकर से हासिल कीमती सीखों को याद करती हैं. उनके ऋण को मस्तक पर उठाए उन उपलब्धियों पर गर्व करती हैं जो गुरू के आशीष के बगैर संभव नहीं थीं.

प्रभा अत्रे… माने कला के कई सारे रंगों से मिलकर पकी हुई वो प्रतिभा जो गायन, लेखन, अध्यापन और अभिनय में प्रवीण होकर अपना विलक्षण व्यक्तित्व गढ़ती हैं. रेडियो और दूरदर्शन से लेकर सारस्वत सभाओं तक जिसकी कंठ माधुरी में बिरमने अनगिनत श्रोताओं का हुज़ूम उमड़ता है. पद्मश्री, पद्भूषण और संगीत नाटक अकादेमी सम्मान उनकी साधना और चिंतन-मनन के सतत प्रवाह में नई हिलोर जगाते हैं.

बार-बार उनकी गायी बंदिशों में डूबने-उतराने को मन करता है- “नदिया धीरे बहो…. कौन गली गयो श्याम… जमुना किनारे मेरा गाँव….”. ठुमरी, खमाज और दादरा की लय-लोच और लालित्य के राग-रस में भीगकर अनोखे आनंद का आकाश खुलने लगता है. यह सब सुनते-गुनते संगीत के रहस्य को, उसकी भाव-संपदा को, उसके आस्वाद के धरातल को नए विमर्श में साझा करने की उत्कंठा होती है और ऐसे में प्रभा अत्रे की कि़ताब ‘स्वरमयी’ किसी कुंजी की तरह समाधान के द्वार खोल देती है.

अपने जीवन व्यापी अनुभवों का सार समेटे वाग्देवी की यह विनम्र उपासक जब अपनी जीवन यात्रा के विभिन्न पड़ावों को याद करती हैं तो संघर्ष चुनौतियों और कामयाबियों के कई मंज़र रौशन होने लगते हैं.

याद आती है, एक वासंती सुबह जब भोपाल के बड़े ताल के किनारे एक होटल में ‘ताई’ से मुलाक़ात हुई थी. साथ में आकाशवाणी भोपाल के कार्यक्रम अधिकारी और शास्त्रीय संगीत के गहरे जानकर रसिक चन्द्रशेखर मुंजे (अब स्मृति शेष) भी थे. क़रीब डेढ़ घंटे के वार्तालाप में ‘ताई’ ने हर सवाल का बेबाकी से जवाब दिया.

पहला सवाल, कि प्रभाजी परिवर्तन प्रकृति का नियम है. हर नया दौर अपने साथ सोच-विचार, चिन्तन का नया धरातल लेकर आता है. भारतीय शास्त्रीय संगीत के मौजूदा परिदृश्य पर नज़र डालें तो बदलाव वहाँ भी दिखाई देता है. इस नवाचार का कुछ लोग स्वागत करते दिखाई देते हैं तो कुछ परंपरावादी इसकी खि़लाफ़त करते हैं. आपकी क्या राय है? …प्रभाजी ने संयत होकर कहा- “संगीत को भी समय के साथ जाना है.

अगर हम सुनने वाले, गाने वाले बदल रहे हैं तो हमसे जो निर्माण होता है वह भी उसी ढंग का होगा. संगीत में यह सब व्यावसायिक दृष्टिकोण जुड़ जाने के कारण हुआ है. आज कंज्यूमर आइडिया आ गया है. ग्राहक सामने है. लेकिन कलाकार को ख़ुद को सोचना है कि उसे कितना बदलना है, श्रोता को अपने स्तर पर उठाना है कि नहीं. जो कलाकार ऐसा करते हैं वे ज़्यादा लोगों के सामने नहीं आते क्योंकि लोग उन्हें पसंद नहीं करते हैं.

मतलब जो श्रोताओं के स्तर पर जाना ज़्यादा पसंद करते हैं उनके ज़्यादा कार्यक्रम होते हैं और मीडिया उनका प्रचार करता है. ऐसे वातावरण में महज़ संगीत को दोष देना ठीक नहीं है. संगीत अपनी जगह पर कायम है, क्योंकि शास्त्रीय संगीत शाश्वत है. उसमें जो शुद्धता है, जो डिग्निटी है और सौन्दर्य भी जो अपने आप में कायम है, उसको आप हाथ नहीं लगा सकते. जो बदलाव आपको लगता है वह भी मेरे ख्याल से टेम्परेरी होगा. मतलब जो बात चलती नहीं उसको आप छोड़ ही देते हैं न? और जो बदला है वह पूरा का पूरा ख़राब है, ऐसी भी बात नहीं है, कुछ अच्छा परिवर्तन हमें स्वीकारना भी चाहिए.”

प्रभाजी, इधर नई पीढ़ी के संगीतकारों को लेकर अक्सर कहा जाता है कि उनके पास धैर्य, समर्पण की कमी है. वे गंभीर रियाज़ से परहेज़ करते हैं…….और गुरुओं के पास भी सिखाने के लिए वक्त नहीं है. इस सवाल के जवाब में प्रभाजी ने शिव-हरि जैसी कामयाब जोड़ी का जि़क्र किया. कहा कि ये अत्यंत व्यस्त कलाकार हैं. उनके पास सीखना भी तो मुश्किल है. यह भी ज़रुरी नहीं कि अच्छा गाने वाला या बजाने वाला अच्छा शिक्षक हो.

यह भी ज़रुरी नहीं रहा कि आप गुरु के सान्निध्य में चौबीस घण्टे रहो और सीखो, टीचिंग-एड्स इतने हो गये हैं कि उसका सहारा लेकर आप सीख सकते है. अगर आप में गहरी निष्ठा है, थोड़ा कुछ ज्ञान है, पोटेन्शियल कुछ है, तो आप यह कर सकते हैं. अब मेरे पास जितनी लड़कियाँ आ रही हैं, रोज़ाना तो उनको नहीं सिखा पा रही हूँ. टेप-रिकार्डर है तो मेरा पूरा लेसन टेप हो जाता है. उनको नोटेशंस लिखकर देती हूँ और बोलती हूँ कि तीन-चार दिन इसको ठीक करो फिर मेरे पास आओ.

उतने में मैं और किसी को सिखा सकती हूँ. तो यह सहारा लेकर भी हम कर सकते हैं. हालांकि यह सब गुरु की रिप्लेसमेण्ट बिल्कुल नहीं है. पहले तो उन्हीं से सीखना चाहिए और बाद में इनका सहारा लेना चाहिए. पहले गुरु एक ही जगह रहते थे. आज इधर, कल उधर वाला ज़माना चला गया. एक्सपोजर बढ़ गया है, मुझे याद है कि मुझे गाना सुनना होता था तो मेरे पिता जी जब तक नहीं आते थे साथ में, कभी सुनने को नहीं मिलता था.

बहुत सी जगह मैं अपने शिष्यों को साथ लेकर जाती हूँ. लोगों को अच्छा लगता है तो बुलाते हैं उनको. मेरा फ़जऱ् बनता है कि जो अच्छे स्टूडेण्ट्स हैं वे आगे बढ़ें. उनको भी तो सही समय पर प्रोत्साहित करना है. ऐसा नहीं है कि वे जब बूढ़े हो जायें तब उनको आगे करना है और तब तक हमीं जमे रहें मंच पर. ऐसा नहीं होना चाहिए. लेकिन अज़ीब बात ये है कि श्रोता भी बड़े नामों से ग्रसित होते हैं. नए लोगों को सुनने के लिए कोई नहीं आता. इन लोगों की रिस्पांसिबिलिटी हमारे ऊपर है. आयोजकों को भी गंभीरता से सोचना चाहिए.

मसला कलाकारों के मानदेय यानी फीस पर जाकर टिकता है तो मिला-जुला सा स्वर सुनाई देता है. ताई का मानना है कि रेडियो की जो फीस है उसके ऊपर आप लिविंग नहीं कर सकते. कलाकार भी एक पारिवारिक इंसान है. खर्चा कहाँ से निकालेगा वह? यह भी नहीं कि आप लाखों रूपयों की मांग करें. जब तक कि कोई कारपोरेट सेक्टर आता नहीं सामने, आपको मिलती नहीं है उतनी फीस. और ऐसे आयोजकों को वे ही नाम याद आते हैं जिन्हें मीडिया वालों ने एक्सपोज़ किया है.

इन तथाकथित बड़े कलाकारों ने अगर फीस बढ़ा ली है तो क्या करें? गिनती के नाम हैं वे ही रिपोर्ट होते रहते हैं. बाकी ट्यूशंस करते हैं, कोई और काम करते हैं और अपना गुज़ारा करते हैं. मैं तो अपनी शिष्याओं को बोलती हूँ कि कैरियर बतौर भी लेना संगीत को. लोगों से मिलना-जुलना, कुछ चर्चा करना सीखो. इसके बिना होगा नहीं. अगर मैं अच्छी भी गाती हूँ और घर में रहूँ तो आपको क्या मालूम?

बात विदेश यात्राओं की छिड़ी तो प्रभाजी ने निर्विकार भाव से कहा कि देखिए आजकल तो कोई भी उठके चला जाता है विदेश. मैं तो अब डॉक्टर नहीं लगाती अपने नाम के आगे. डॉक्टर भी इतने हो गये हैं कि उसका कुछ मायना नहीं रहा. विदेश में कार्यक्रम देना भी अब बहुत मुश्किल बात नहीं रही.

बातचीत का सिरा   विद्यालयीन और महाविद्यालयीन स्तर पर संगीत शिक्षण के पास पहुँचा. प्रभा अत्रे ने खुलकर कहा कि संगीत खाली सर्टिफिकेट से नहीं आता. सामने बाजा है और आपको गाना है. मतलब जब ऑडीशन होगा तभी कलाकार सीखने लायक और सिखाने लायक है कि नहीं, यह पता चलेगा. गुरु ने सिखाया और वैसा हम गा रहे हैं, ऐसा थोड़ी होता है. ख़ुद का जो विचार-सोच है वह भी तो साफ़ होना चाहिए. एनालिटिकल आब्जेक्टिविटी आनी चाहिए सिखाने में.

हमारी शिक्षण पद्धति में निश्चय ही सुधार की गुंजाइश है. मैं जहाँ पढ़ाती थी, वहाँ का पूरा सिलेबस मैंने चेंज किया था. जब मैं रिटायर हो गयी तो फिर से वही हाल. मैं क्या करूँ? क्योंकि उनको काम करना पड़ता था उसके लिए, उनको पढ़ना पड़ता था. नये टॉपिक्स जो आये, उसके लिए रीडिंग मटेरियल्स तैयार करके रखा था, फिर भी ये हालत हुई. मेरे जाने के बाद फिर पूरा का पूरा चेंज किया. कई सेमीनारों में मैंने इस मुद्दे को गंभीरता से उठाया लेकिन कुछ न हुआ.

संगीत की समीक्षा के मौजूदा परिदृश्य पर प्रभाजी की टिप्पणी ग़ौरतलब हैं. वे कहती हैं कि संगीत का आनंद हर कोई उठाता है, अपने-अपने स्तर पर समझता है उसको. लेकिन जब कोई समीक्षात्मक ढंग से लिखे कि इस राग में यह स्वर ऐसा हुआ, वैसा हुआ तब मैं चेलेंज करुंगी. जब आप शास्त्र या शैली पर मत व्यक्त करेंगे तो हम उस पर शास्त्रार्थ करेंगे. हम आसानी से स्वीकार नहीं करेंगे. समीक्षा रिस्पांसिबल काम है. वह गायक के बारे में समाज की धारणा तैयार करती है. हमें उसे गंभीरता से लेना चाहिए. कुछ पत्र-पत्रिकाएं इसे गंभीरता से लेते हैं लेकिन अधिकांश बड़े ही उदासीन, ग़ैर जि़म्मेदार इसके लिए संगीत-समाज को भी जागृत होने की ज़रुरत है.

इस लंबे संवाद में प्रभाजी सम्मान लौटाने की वृत्ति पर भी खुलकर बोलीं. उन्हें इस बात का एतराज़ है कि सम्मान लेकर फिर वापस किये जाएँ! जब पद्म अवार्ड के लिए आपका चुनाव होता है तो आपसे पूछा जाता है कि आप लेंगे या नहीं. उस वक्त हम लोग बोल सकते हैं कि हमको नहीं लेना है. पर अगर वे ऐसा गुपचुप करें तो पब्लिसिटी नहीं होगी. अगर आपका नाम एनाउंस किया और फिर आपने वापस किया तो वह अलग तरह से मीडिया में आयेगा. मेरा पद्मभूषण बहुत लेट आया. मैंने सोचा कि मैं अपने लिए नहीं ले रही हूँ. मेरे माँ-बाप हैं उनको खुशी होगी. मेरे फ्रेण्ड्स प्रसन्न होंगे. यह मेरे हाथ में था कि लेना है कि नहीं. मुझे उस वक्त मालूम हुआ कि लिस्ट में मेरा नाम दस वर्ष से आ रहा है.

संगीत के साथ यह जन्म गुज़ारते हुए क्या अनुभूति होती है? ताई इस सवाल पर संजीदा हो जाती हैं- “संगीत के लिए तो कई जन्म चाहिए, एक जन्म की तो बात है नहीं. एक जन्म में एक सुर भी हाथ नहीं आता. पता नहीं और कितने जन्म मैंने ले लिये तो इस जन्म में संगीतकार बनी. घर में बिल्कुल संगीत नहीं था. हमारे घर में माताजी-पिताजी दोनों टीचर थे. उन्होंने गाना सुना भी नहीं था तो ज़ाहिर है कि पूर्व जन्म का कुछ होगा मेरे पास तभी मैं इतना कर पायी. और आशीर्वाद है गुरुओं के, श्रोताओं की शुभेच्छा मेरे साथ हैं. यह सब अगर नहीं मिलता तो मैं यहाँ तक पहुँचती नहीं.

(डिस्क्लेमर: ये लेखक के निजी विचार हैं. लेख में दी गई किसी भी जानकारी की सत्यता/सटीकता के प्रति लेखक स्वयं जवाबदेह है. इसके लिए News18Hindi किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं है)



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