Gyan Ganga: ईश्वर ने यह शरीर दिया है कर्म करने के लिए अपनी ज़िम्मेदारी से भागने के लिए नहीं


प्रिय व्रत चरित्र राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से पूछा- हे प्रभों ! स्वायम्भुव मनु के ज्येष्ठ पुत्र प्रियव्रत बड़े ही उच्च कोटि के भगवत भक्त थे। गृहस्थाश्रम मे उनकी रुचि कैसे हुई और घर-परिवार में आसक्त रहकर भी उन्होने सिद्धि कैसे प्राप्त की?

सच्चिदानंद रूपाय विश्वोत्पत्यादिहेतवे !

तापत्रयविनाशाय श्रीकृष्णाय वयंनुम:॥ 

प्रभासाक्षी के श्रद्धेय पाठकों ! आज-कल हम सब भागवत कथा सरोवर में गोता लगा रहे हैं। 

पिछले अंक में हमने पृथु महाराज का चरित्र सुना था जिन्होने पृथ्वी पर राज करते हुए सौ अश्वमेध किए। उनकी यज्ञशाला में साक्षात श्री विष्णु भगवान का प्रादुर्भाव हुआ था। उन्होने अपनी प्रजा की संतान की तरह देख-भाल की थी। अंत में घोर तपस्या करते हुए परलोक को सिधार गए।

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आइए ! अब आगे की कथा प्रसंग में चलते हैं—

प्रिय व्रत चरित्र राजा परीक्षित ने शुकदेव जी से पूछा- हे प्रभों ! स्वायम्भुव मनु के ज्येष्ठ पुत्र प्रियव्रत बड़े ही उच्च कोटि के भगवत भक्त थे। गृहस्थाश्रम मे उनकी रुचि कैसे हुई और घर-परिवार में  आसक्त रहकर भी उन्होने सिद्धि कैसे प्राप्त की?

प्रियव्रतो भागवत आत्माराम: कथं मुने 

गृहेSरमत् यन्मूल: कर्मबन्ध: पराभव:।

शुकदेवजी महाराज ने कृष्ण-कथा मे परीक्षित का अतिशय अनुराग देखकर कथा शुरू की। बाढ्मुक्त्म राजन तुम्हारा कथन बहुत ही ठीक है। प्रियव्रत बड़े ही भगवत भक्त थे। महर्षि नारद के उपदेश से उनको आत्म-ज्ञान हुआ था। पिता स्वायम्भुव मनु ने उन्हें बहुत समझाया राज-पाठ स्वीकार करो गृहस्थ धर्म का पालन करो। प्रियव्रत का तो मन सचितानन्द मे लगा था। उन्होने पिता की बात नहीं मानी। अब ब्रह्मा जी को चिंता हुई प्रजा का पालन कौन करेगा? सृष्टि का विस्तार कैसे होगा उनको तो इसी बात की चिंता लगी रहती है। देवताओं को साथ लिया प्रियव्रत के पास आए और मार्मिक उपदेश दिए।  

भवाय नाशाय च कर्म कर्तुं 

शोकाय मोहाय सदा भवाय 

सुखाय दुखाय च देह योग 

मव्यक्त दिष्टं जनतांग धत्ते।।

ब्रह्मा जी ने कहा- प्रियव्रत ! ईश्वर ने यह शरीर दिया है कर्म करने के लिए अपनी ज़िम्मेदारी से भागने के लिए नहीं। ऐसे लोगो को दुनिया भगोड़ा कहती है। मनुष्य को चाहिए कि कर्म करते हुए ईश्वर मे चित्त लगाए। 

आहार निद्रा भय मैथुनम च सामान्य मेतत पशुभिर्नराणाम  

कर्मो ही तेषामधिको विशेष: कर्मेण हीना: पशुभि: समाना: ॥ 

तुलसी बाबा ने भी कर्म की महिमा बताते हुए कलम चलाई। क्या कहा –

कर्म प्रधान विश्व करि राखा, जो जस करही सो तस फल चाखा।  

इस जगत को कर्म चाहिए। निकम्मे लोगों को यह संसार ठुकरा देता है।

जब विधाता ने प्रियव्रत को इस प्रकार समझाया तब उन्होने सिर झुका लिया।

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स्वायम्भुव मनु ने ब्रह्मा जी का आभार माना और उनकी आज्ञा लेकर प्रियव्रत को समस्त भूमंडल का राजा बना दिया। अब पृथ्वी पति महाराज प्रियव्रत ने भगवान की कृपा समझकर राज-काज मे लग गए। प्रजापति विश्वकर्मा की बेटी बर्हीश्मती से विवाह हुआ। उससे उनके दस पुत्र हुए। उन्होने ग्यारह अरब साल तक राज किया। उनकी विशेषता यह थी कि वे सब भोग भोगने लगे किन्तु उन भोगों मे आसक्ति नहीं थी। वो तो सचितानन्द मे थी। कहीं एक जगह ही तो रहेगी। एक बार उन्होने देखा कि सूर्य के दक्षिणायन होने के कारण पृथ्वी के आधे हिस्से मे अंधेरा हो गया है। उनको यह बात पसंद नहीं आई। मैं रात को भी दिन बना दूँगा ऐसा संकल्प कर सूर्य के समान ही एक ज्योतिर्मय रथ पर चढ़कर सूर्य का पीछा किया और पृथ्वी की सात परिक्रमा कर डाली। रथ के पहिये से जो गड्ढे बने वे ही सात समुद्र बन गए। पृथ्वी मे सात द्वीप बन गए। अंत मे अपने पुत्रों मे यह पृथ्वी बाँट दी और हृदय में  वैराग्य धारण कर भगवत चिंतन करते हुए परमपद को प्राप्त हुए। 

अब प्रियव्रत के पुत्र आग्निध्र हुए, आग्निध्र के पुत्र राजा नाभि, नाभि के पुत्र श्री ऋषभ देव जी महाराज। संस्कृत मे ऋषभ का अर्थ होता है श्रेष्ठ। यश, पराक्रम और विद्या मे श्रेष्ठ होने के कारण राजा नाभि ने उनका ऋषभ नाम रखा था। ऋषभ देव जी महाराज अत्यंत सुंदर थे। उनके रूप-सौंदर्य पर मुग्ध होकर देवराज इंद्र ने अपनी पुत्री जयन्ती का विवाह इनसे किया था। उनका मानना था कि यह मानव शरीर मोक्ष प्राप्ति के लिए मिला है। कुत्ते सूअर की तरह पेट पालने के लिए नहीं। उन्होने अपना जीवन भगवत भक्ति मे लगाया। उनके सौ पुत्र हुए। सबसे बड़े पुत्र भरत को राजा बनाकर वानप्रस्थ को चले गए। 

महाराज प्रिय व्रत का वंश बड़ा ही उज्ज्वल और सुयशपूर्ण है। जिसमें पुराण पुरुष श्री आदिनारायण ने ऋषभ अवतार लेकर मोक्ष की प्राप्ति कराने वाले पारमहंस्य धर्म का आचरण किया। श्री शुकदेव जी महाराज कहते हैं— हे, राजन ! जो मनुष्य इस परम मंगलमय प्रियव्रत के पवित्र चरित्र को श्रद्धापूर्वक सुनते या सुनाते हैं उन दोनों को भगवान श्रीकृष्ण अपनी अनन्य भक्ति प्रदान करते हैं। एक बात ध्यान में रखनी चाहिए कि, भगवान अपने भक्तों की सारी मनोकामना पूरी कर सकते हैं। उन्हे मुक्ति भी दे देते हैं, परंतु मुक्ति से भी बढ़कर जो भक्ति है उसे आसानी से नहीं देते। रामचरित मानस में भगवान श्रीराम शबरी को भक्ति की महिमा बताते हुए कहते हैं—

भगति हीन नर सोहई कैसा, बिनु जल बारिद देखिय जैसा।  

जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, गुण, धन, कुटुंब और चतुराई इन सबके होने पर भी भक्ति के बिना मनुष्य वैसा ही लगता है जैसे कि जल हीन बादल। भक्ति मानव का अलंकार है। 

जय श्री कृष्ण —–   

                                           

क्रमश: अगले अंक में ————–

श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे हे नाथ नारायण वासुदेव ———-

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।

– आरएन तिवारी

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