Tuesday, June 28, 2022
HomeNewsFathers Day Story: Fathers Day Inspirational Story: ​Father's Day: वक्त के साथ...

Fathers Day Story: Fathers Day Inspirational Story: ​Father’s Day: वक्त के साथ बदल जाते हैं पिता या उम्र के साथ बदलती है हमारी समझ?


जब तुम पिता बनोगे, तब समझोगे…ये बात लगभग सभी लड़कों ने अपने पापा से सुनी होगी। उस समय इस बात की गहराई शायद ही किसी को समझ में आए। जब इसके मायने समझ में आते हैं, कई बार तब तक वक्त बीत चुका होता है। घरों में पिता की छवि ऐसी बनी होती है जो हमेशा सख्त रहते हैं, डांटते रहते हैं, हंसी-मजाक जिन्हें पसंद नहीं। यही वजह है कि जिस तरह नौजवान अपनी मां से दिल की बात कह लेते हैं, वैसी पिता से कहने की हिम्मत नहीं कर पाते। सच तो ये है कि ज्यादातर युवा अपने पिता को गले लाकर अपने प्यार का इजहार भी नहीं कर पाते। लेकिन धीरे-धीरे वक्त के साथ पता लगता है कि पिता होना क्या होता है और तब यही बात याद आती है ‘जब तुम पिता बनोगे, तब समझ आएगा।’

​मेरे पापा मेरे हीरो

navbharat times

बचपन में एक दौर होता है जब हमारे पापा हमारे हीरो होते हैं। तब वो कूल डूड और मम्मी से भी ज्यादा करीब होते हैं। छठी क्लास में पढ़ने वाली अनन्या तिवारी 10 साल की हैं। वह कहती हैं, ‘मेरे पापा बहुत अच्छे हैं। वो स्मार्ट हैं, स्टाइलिश हैं, उनको सब पता है, वो डांटते भी नहीं हैं और कूल डूड लगते हैं। वो पूरे परिवार का जिस तरह ख्याल रखते हैं, वो आसान नहीं है। काम से आने के तुरंत बाद भी वो थके नहीं होते बल्कि हमारे साथ खेलते हैं। उनकी बातें भी नए जमाने की होती हैं और वो बुड्ढों की तरह व्यवहार भी नहीं करते। पिछले साल उन्होंने मुझे कश्मीर घुमाया और जन्मदिन पर साइकिल लाकर भी दी। वो प्यार भी खूब करते हैं। एक बेटी को आखिर अपने पिता से और क्या चाहिए होता है। इसलिए वो मेरे हीरो हैं।’

​थोड़ी सी बस दूरी

navbharat times

टीनेज में जब बच्चों में ढेर सारे बदलाव आते हैं तो पिता का स्वाभाव भी बदला लगने लगता है। तब ऐसा लगता है कि वो तो हर चीज में रोक-टोक करते हैं। 18 साल के मोहम्मद फैजान का अनुभव भी कुछ-कुछ ऐसा ही है। वह कहते हैं, ‘सबकी तरह मेरे पापा भी पढ़ाई पर मुझे टोकते हैं। या फिर जब बहुत देर तक दोस्तों के साथ घूमता हूं तो बोलते हैं कि इतना समय मत बर्बाद किया करो। मुझे एक बार लगा था कि पापा और मेरे ख्याल मिलते नही हैं। तब मैं डांस में करियर बनाना चाहता था लेकिन पापा का कहना था कि ये सब बड़े लोगों की चीजें हैं और इन सब में कोई फ्यूचर नहीं रखा है। इसके अलावा कुछ साल पहले जब मैंने एंड्रॉइड फोन लेने की बात कही थी तब भी उन्होंने खूब कहा था कि ये सब चीजें आदत खराब करती हैं और इनमें अपना वक्त मत खराब करो।’

​पुराने ख्यालों के हैं पापा

navbharat times

देश-दुनिया में बाहर निकलकर बच्चे जब करियर बनाते हैं तब पिता की चिंताएं भी बढ़ जाती हैं। ऐसे में अगर रोक-टोक बढ़े तो मतभेद होना भी तय है। सीनियर कॉन्टेंट राइटर के तौर पर काम करने वाली 23 साल की शिवानी की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। वह कहती हैं, ‘वैसे तो पापा बहुत अच्छे हैं। मगर शायद कई चीजों को वो समझ नहीं पाते हैं। वो थोड़े पुराने ख्यालों के हैं, इसलिए हमारे ख्याल कम मिलते हैं। वो हमारी चिंता ज्यादा करते हैं, इसलिए कई बार ऐसी रोक-टोक करते हैं जो शायद जरूरी ना हो। शायद उन्हें कई बार लगता होगा कि मैं बड़ा काम कर नहीं सकती हूं लेकिन मैं कहती हूं कि कम से कम एक मौका तो दो। कुछ समय पहले मुझे विदेश में नौकरी का मौका मिला था लेकिन वो माने नहीं। मुझे थोड़े हेल्थ इशू रहे हैं बचपन से, इसलिए उन्हें लगता है कि मैं अकेले रहूंगी तो मुझे कुछ हो जाएगा। मगर मैं कहती हूं कि एक मौका तो दो।’

​तब मिट गईं दूरियां

navbharat times

मगर उम्र के साथ जब स्वाभाव में परिपक्वता आती है तो समझ भी बदलती है और रिश्ते भी सुधरते हैं। प्राइवेट जॉब करने वाले 31 साल के सचिन चाब के रिश्ते भी अपने पिता के साथ ऐसे ही सुधरे। वह बताते हैं, ‘एक वक्त था जब मैं अपने पिता से बात तक नहीं करता था। एक ही घर में रहते हुए लगभग दो साल तक हमारी बात नहीं हुई। दरअसल वो नौकरीपेशा आदमी थे जबकि मैंने रेस्टोरेंट का बिजनेस किया था। तब वो कहते थे कि चूंकि बिजनेस हम लोगों ने कभी चलाया नहीं, इसलिए एकदम से बड़ा बिजनेस खोलना ठीक नहीं। लेकिन तब वो बात समझ नहीं आती थी। लेकिन जब बिजनेस में घाटा हुआ और सारे दोस्तों ने साथ छोड़ दिया तब केवल एक दोस्त बचा था जिसने मेरा सारा नुकसान भरा। वो मेरे पिता थे। वो हमेशा बचत करने की बात कहते थे। मगर मुझसे बचत नहीं होती थी। फिर जब कोविड के दौर में एकदम सैलरी 50 फीसदी घट गई तब बचत का महत्व समझ आया। अब लगता है कि हां वो बहुत कुछ ठीक कहते हैं।’

​देर से समझ आते हैं पिता

navbharat times

फिर एक वक्त आता है जब वो बेटा खुद पिता बन चुका होता है और उनके बच्चे बड़े हो रहे होते हैं। तब जिम्मेदारियां, समाज और फाइनैंशियल स्थिति जैसी तमाम चीजें देखकर फैसले लिए जाते हैं। तब पापा की कही ढेर सारी बातों का अहसास होता है। 36 साल के गौरव श्रीवास्तव का बेटा खुद 5 साल का है। वह कहते हैं, ‘ये सच है कि लड़के मां के करीब होते हैं क्योंकि पापा के पास इतना समय भी नहीं होता था। तो लगता था कि पापा कितने सख्त हैं और एक अनकही दूरियां थीं। मगर आज जब खुद पिता बनकर उन चीजों को पलटकर देखता हूं तो अहसास होता है कि इतना आसान नहीं होता ये सब करना। मेरे पिता ने मुझे पढ़ाने के लिए लोन तक लिया। मेरी सारी जरूरतें उन्होंने पूरी कीं भले ही वो नाजायज क्यों ना हो। उसके लिए कुछ भी करना पड़ा, तो वो मेरे पिता ने किया मगर कभी भी मुझे मना नहीं किया। एक वक्त बच्चों को लगता है कि पापा ने बस पैसा ही तो दिया। लेकिन उस पैसे के लिए कितनी मेहनत और कुर्बानियां होती हैं, ये तब समझ नहीं आता। और फिर उनके पीछे कितनी सारी अनदेखा सपोर्ट होता है, ये अब समझ आता है।’



Source link

RELATED ARTICLES

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

- Advertisment -

Most Popular

Recent Comments