ED NIA Action on PFI: ईडी और एनआईए की पीएफआई पर कार्रवाई के बाद यूपी के हिंसा मामलों में संगठन की संलिप्तता का मामला सामने आया है योगी सरकार ने पीएफआई को बैन करने की सिफारिश की थी


लखनऊ: उत्तर प्रदेश में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया के ठिकानों पर छापे मारे जा रहे हैं। देश के 11 राज्यों में छापेमारी चल रही है। इस क्रम में यूपी में छापेमारी के क्रम में 8 संदिग्धों को गिरफ्तार किया गया है। लखनऊ से यूपी एटीएस ने छापेमारी कर इंदिरा नगर से एक संदिग्ध आतंकी को गिरफ्तार किया है। उसकी निशानदेही पर एक अन्य संदिग्ध को हिरासत में लिया गया है। वहीं, वाराणसी से दो लोगों को पकड़ा गया है। प्रदेश में पीएफआई की गतिविधियों को ध्यान से देखें तो आप पाएंगे कि हाल के दिनों में पीएफआई की लगभग हर बड़े मामले में संलिप्तता की बात सामने आई है। हाथरस कांड के बाद मचे बवाल में पीएफआई के हाथ होने की सूचना मिली थी। इसके अलावा हिजाब कांड हो या फिर ज्ञानवापी मस्जिद मामले में कोर्ट का फैसला, पीएफआई ने इन मामलों को भड़काने की कोशिश की। नुपुर शर्मा विवाद के बाद जुमे पर यूपी में भड़की हिंसा के मामले में भी पीएफआई कनेक्शन सामने आया था।

हाथरस कांड के दौरान आया था सीएफआई का नाम
यूपी में हाथरस कांड के दौरान सीएफआई का नाम सामने आया है। प्रवर्तन निदेशालय ने हाथरस दंगों की साजिश में पीएफआई और उसके स्टूडेंट विंग कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया (सीएफआई) के पांच सदस्यों के खिलाफ लखनऊ की स्पेशल एमपी-एमएलए कोर्ट में चार्जशीट दाखिल किया था। ईडी की ओर से जिनके खिलाफ चार्जशीट दायर की गई, उनमें सीएफआई के राष्ट्रीय कोषाध्यक्ष अतिकुर रहमान, सीएफआई दिल्ली के महासचिव मसूद अहमद, पत्रकार सिद्धिकी कप्पन और मोहम्मद आलम शामिल थे। जांच के दौरान पता चला था कि हाथरस में दंगें करवाने की पूरी साजिश सीएफआई के राष्ट्रीय महासचिव केए राउफ शरीफ ने तैयार की थी। सभी उसी के इशारे पर हाथरस जा रहे थे। हाथरस कांड में पीएफआई की संलिप्तता के बाद राज्य सरकार ने संगठन को गंभीरता से लेना शुरू किया।

किसान आंदोलन के दौरान भी उछला था नाम
पीएफआई का नाम किसान आंदोलन के दौरान भी उछला था। खुफिया एजेंसियों को किसान आंदोलन के दौरान पीएफआई की ओर से हिंसा का इनपुट मिला था। इसके बाद मेरठ समेत कई स्थानों पर पीएफआई के ठिकानों पर छापे मारे गए थे। पीएफआई और एसडीपीआई की ओर से इस दौरान हिंसा फैलाने की कोशिश का मामला सामने आया था। ऐसा दावा किया गया था कि पीएफआई और एसडीपीडीआई की ओर से किसान नेताओं के खिलाफ हमला कर पूरे विवाद को एक नया रूप दिया जाए। हालांकि, खुफिया एजेंसियों की कार्रवाई हुई तो पीएफआई के दफ्तरों में ताले लटके नजर आए थे।

जुमा हिंसा के दौरान भी गरमाया मामला
नुपुर शर्मा विवाद के बाद यूपी में करीब आठ शहरों में जुमे की नमाज के बाद माहौल को गरमाने की कोशिश की गई। कानपुर से लेकर प्रयागराज तक हिंसा को भड़काने की कोशिश की गई। इस संगठन से जुड़े लोगों की गिरफ्तारियां हुईं। यूपी एटीएस की ओर पीएफआई और उसके लिंक संगठनों से जुड़ी जानकारी मांगी है। इन संगठनों के हर मेंबर का 8 बिंदू पर बायोडाटा भेजा गया। नूपुर शर्मा के विवादित बयान के बाद उत्तर प्रदेश में कई शहर में हिंसा हुई थी। कानपुर से शुरुआत के बाद पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया का नाम सामने आया। पीएफआई के लिंक संगठन एसडीपीआई, कैंपस फ्रंट ऑफ इंडिया, ऑल इंडिया इमाम काउंसिल, रेहाब इंडिया फाउंडेशन, एनसीएचआरओ की भी भूमिका होने की बात सामने आई थी।

सीएए-एनआरसी आंदोलन के दौरान बड़ी भूमिका
सीएए-एनआरसी को लेकर देश भर में हुए धरना-प्रदर्शनों में पीएफआई की बड़ी भूमिका सामने आई थी। यूपी के भी विभिन्न शहरों में माहौल को खराब करने का प्रयास किया गया। लखनऊ में भी बड़े पैमाने पर हिंसा हुई थी। इस मामले में राजधानी समेत मेरठ, शामली समेत कई जिलों से पीएफआई के सदस्यों की गिरफ्तारियां हुई। सीएए हिंसा मामले में शाहीनबाग में महीनों तक धरना चला। दावा किया जाता है कि पीएफआई की ओर से इस धरना-प्रदर्शन को फंडिंग की गई। वर्ष 2019 में इस मामले को बड़े स्तर पर देखा गया था। यूपी में बड़े पैमाने पर हिंसा फैलाने की साजिश का खुलासा किया गया था। इसके बाद कई स्थानों पर छापे मार कर आरोपियों को हिरासत में लिया गया था।

हिजाब विवाद में भी आया नाम
हिजाब विवाद में भी पीएफआई का नाम सामने आया था। कर्नाटक के एक शैक्षणिक संस्थान से शुरू हुए हिजाब विवाद को राष्ट्रीय स्तर पर उठाने की कोशिश की गई। यूपी के विभिन्न शहरों में युवाओं को भड़काने में पीएफआई के संगठन एसडीपीआई की भूमिका सामने आई। गाजियाबाद से लेकर प्रयागराज तक के शैक्षणिक संस्थानों में युवाओं को भड़काने का प्रयास किया गया। इस मामले में सीएम योगी ने साफ कर दिया था कि शैक्षणिक संस्थानों में निर्धारित ड्रेस कोड के आधार पर ही विद्यार्थियों को प्रवेश दिया जाएगा। किसी भी स्थिति में माहौल को खराब नहीं होने दिया जाएगा। सरकार की सख्ती के बाद इस मामले को भड़काने की कोशिश नाकाम हुई थी।

योगी सरकार ने की थी बैन की सिफारिश
योगी आदित्यनाथ सरकार ने पीएफआई को बैन करने की सिफारिश सीएए-एनआसी आंदोलन में संगठन की भूमिका सामने आने के बाद की थी। सरकार की ओर से गृह मंत्रालय को इस संबंध में पत्र भेजा गया था। गृह मंत्रालय की ओर से इस मामले में बड़े स्तर पर कार्रवाई शुरू की गई। खुफिया एजेंसियों को पीएफआई की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए लगाया गया। अब इस संगठन के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई है।

क्या है पीएफआई?
दक्षिण भारत परिषद नामक एक मंच का गठन 26 जनवरी 2004 को बेंगलुरु में किया गया। बेंगलुरु में हुई बैठक में कर्नाटक से फोरम फॉर डिग्निटी, केरल से नेशनल डेवलपमेंट फ्रंट और तमिलनाडु से मनिथा नीथी पासराय शामिल हुए। बाद में इस मंच को विस्तारित करने का निर्णय लिया गया। 22 नवंबर 2006 को केरल के कालीकट में मंच की बैठक हुई। इस बैठक में पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया को लॉन्च करने का निर्णय लिया गया। देश के 23 राज्यों में पीएफआई के विस्तार की बात कही जाती है। हालांकि, इस संगठन से जुड़े सदस्यों को लेकर पीएफआई कोई जानकारी नहीं देता है।

पहले पीएफआई का मुख्यालय केरल के कोझिकोड में था। अब यह दिल्ली के शाहीनबाग में है। पीएफआई के अध्यक्ष ओएमए सलाम और ईएम अब्दुल रहीमान उपाध्यक्ष हैं। पीएफआई ने लगातार अपना विस्तार किया है। इस संगठन से गोवा का सिटीजन फोरम, राजस्थान का कम्युनिटी सोशल एंड एजुकेशनल सोसाइटी, आंध्र प्रदेश का एसोसिएशन ऑफ सोशल जस्टिस भी जुड़ गया है।

कमजोरों की आवाज बनने का दावा
पीएफआई अपने वेबसाइट पर दावा करता है कि इस संगठन का उद्देश्य राष्ट्रीय एकता, साम्प्रदायिक सौहार्द और सामाजिक समरसता को बढ़ावा देना है। देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था, धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था और कानून के शासन को बनाए रखना है। यह संगठन खुद को कमजोर वर्ग के लिए काम करने वाला बताता रहा है। पिछड़े वर्ग की पहचान की रक्षा, पिछड़े वर्ग के लिए योजना बनाने और मानवाधिकार उल्लंघन के खिलाफ लोगों को एकजुट करने के भी दावे किए जाते रहे हैं। हालांकि, अब इस संगठन पर देश में कई स्थानों पर दंगा भड़काने का भी मामला सामने आया है।



Source link

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: