Friday, June 24, 2022
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Delhi ki roads par har saal bekar bah jata hai barish ka pani kya is baar kaam karega rain Water harvesting system : दिल्ली में इस बार काम करेगा रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम? जानें हर साल दिल्ली की बारिश में बर्बाद होता है कितना पानी


नई दिल्ली : देश की राजधानी दिल्ली में 27 जून से प्री-मॉनसून की बारिश का दूसरा दौर शुरू होगा। संभावना है कि इसी दौरान मॉनसून भी राजधानी में एंट्री ले लेगा। मॉनसून को लेकर इस बार बड़ी तैयारियां हो रही हैं। इसमें जलभराव से निपटने के साथ बारिश के पानी को सहेजने की तैयारियां भी तेजी से चल रही हैं। यमुना किनारे गड्ढे खोदे जा रहे हैं, तो वहीं करीब 1500 RWH पिट बढ़ाए जा रहे हैं। आखिर इन सब तैयारियों के मायने क्या हैं?

दिल्ली में हर साल बारिश का करीब 85 प्रतिशत पानी सड़कों पर बह जाता है। खराब प्लानिंग के कारण यह पानी नालों से होते हुए नदी में जाता है और इसका कोई लाभ राजधानी वासियों को नहीं मिलता। जबकि गर्मी में करीब तीन से चार महीने राजधानी पानी के लिए तरसती है। एक्सपर्ट्स के अनुसार, यदि बारिश के बदलते पैटर्न को समझते हुए बारिश के पानी को सहेजने के उपाय नहीं किए गए तो आने वाले समय में राजधानी में पानी की किल्लत और बढ़ती जाएगी। मौजूदा इन्फ्रास्ट्रक्चर में बारिश के पानी से भूजल स्तर में सुधार की उम्मीद करना बेमानी है।

ड्रेनेज सिस्टम में सुधार की जरूरत
जानकारों के अनुसार, 120 एमएम के करीब बारिश में 87 हजार मिलियन लीटर पानी होता है। इस पानी को सहेजना अब बहुत अधिक मुश्किल इसलिए होता है क्योंकि पिछले कुछ सालों में बारिश की तीव्रता काफी अधिक हो गई है। इसीलिए इंफ्रास्ट्रक्चर, खास तौर पर ड्रेनेज सिस्टम में सुधार की जरूरत है।

ऐसे समझें बारिश के पानी का गणित
सीएसई (सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट) के एक आकलन के अनुसार, राजधानी में पानी की डिमांड प्रतिदिन 2765 मिलियन लीटर यानी 644225 मिलियन लीटर सालाना है। एक व्यक्ति को एक दिन में कम से कम 175 लीटर पानी की जरूरत होती है। सीएसई के अनुसार, इसका अर्थ साफ है कि यदि बारिश के पानी को बचा लिया जाता तो पानी की 20 से 25 प्रतिशत की कमी दूर हो सकती है।

हर साल 2 मीटर तक नीचे जा रहा भूजल स्तर
वहीं मॉनसून के दौरान चार महीने में राजधानी में औसत बारिश 617 एमएम है। यह देश के अन्य हिस्सों की तुलना में काफी कम है। एक्सपर्ट्स के अनुसार, यदि इस पानी को हम रिचार्ज के लिए इस्तेमाल कर सकें तो भूजल स्तर में गिरावट नहीं आएगी। सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड (सीजीबीडब्ल्यू) की एक तहसील स्तर की 2019 की असेसमेंट रिपोर्ट के अनुसार, 34 तहसीलों के असेसमेंट में 22 को अति संवेदनशील, दो को संवेदनशील, सात को सेमी क्रीटिकल और महज तीन को सेफ बताया गया था। एक अन्य रिपोर्ट में साफ हुआ है कि राजधानी का भूजल स्तर हर साल 0.2 से 2 मीटर तक नीचे जा रहा है।

पूरी तरह बदलना होगा इन्फ्रास्ट्रक्चर
सीएसई के वॉटर प्रोग्राम के डायरेक्टर दीपेंद्र कपूर के अनुसार, राजधानी में दो तरह के क्षेत्र हैं- अनप्लांड एरिया और प्लांड एरिया। अनप्लांड एरिया में बारिश के पानी को बचाने का ज्यादा स्कोप नहीं है। इसके लिए इंफ्रास्ट्रक्चर को लगभग पूरी तरह बदलना पड़ेगा, जो सरकार के लिए आसान नहीं हैं। ऐसे एरिया में बरसाती पानी भी सीवर नेटवर्क के जरिए जाता है और बारिश के पानी की वजह से सीवर नेटवर्क ओवरफ्लो रहता है। राजधानी का अधिकांश हिस्सा ऐसा ही है।

ऐसे कर सकते हैं बचत
जबकि प्लांड एरिया में बारिश के पानी को बचाने का काफी स्कोप है। यहां पार्कों, खाली जगहों, बेहतर ड्रेनेज सिस्टम आदि उपाय अपनाकर बारिश के पानी को बचाया जा सकता है। इसके अलावा झीलों को रिवाइव किया जा सकता है। दिल्ली सरकार झीलों पर काम कर रही है जो एक अच्छी शुरुआत कहा जा सकता है। लेकिन ड्राफ्ट मास्टर प्लान-2041 में पानी की कमी के मामले में दिल्ली को आत्मनिर्भर बनाने के कुछ ज्यादा उपाय नहीं हैं। हालांकि कई अच्छे टर्म मास्टर प्लान में जरूर इस्तेमाल किए गए हैं, जैसे कि ब्लू ग्रीन इंफ्रास्ट्रक्चर, इंटीग्रेडेट सस्टेनेबल डिवेलपमेंट आदि… लेकिन यह सब कैसे होगा इसका जिक्र नहीं है।

दिल्ली में 85 फीसदी पानी चला जाता है बर्बाद
पर्यावरण पर काम कर रहे सेफ के विक्रांत तोंगड़ के अनुसार, दिल्ली में खराब प्लानिंग की वजह से बारिश का करीब 85 प्रतिशत पानी बर्बाद चला जाता है। वहीं रोक के बावजूद अभी तक राजधानी में भूजल दोहन काफी अधिक हो रहा है। गर्मियों के दौरान पानी की डिमांड और सप्लाई में 150 से 200 एमजीडी का अंतर रहता है। यदि बारिश के पानी का उपयोग किया जाए तो इस अंतर को 70 से 80 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है।

1000 से ज्यादा झीलें लेकिन…
झीलों पर काम कर रहे एनवायरमेंट एक्टिविस्ट दिवान सिंह का कहना है कि झीलों को रिवाइव कर बरसाती पानी को सहेजना सबसे कारगर उपाय है। गांव की तुलना में शहरों में झीलों को पुनर्जीवित करना आसान है। पक्का सरफेस होने की वजह से बारिश के पानी को यहां झीलों तक पहुंचाना आसान होता है। राजधानी में यदि बारिश के पानी का 50 प्रतिशत हिस्सा भी सहेज लिया जाता है तो 250 एमजीडी के करीब पानी सप्लाई बढ़ाई जा सकती है। वहीं, झीलें राजधानी की बढ़ती गर्मी को भी कम करने में सक्षम हैं। बायोडायवर्सिटी भी लौटा सकती हैं। राजधानी में 1000 से अधिक झीलें हैं। उन्हें बचाने पर तेजी से काम होना चाहिए। इसके अलावा पार्कों के किनारे भी बारिश के पानी को बचाने का काम किया जा सकता है। रोहिणी, द्वारका आदि जगहों पर झीलों को पुनर्जीवित करने का काम काफी आसान भी है। इन जगहों पर काफी झीलें भी हैं।

एक्सपर्ट्स के अनुसार, यदि रेन वॉटर हार्वेस्टिंग सिस्टम पर सही तरीके से काम किया जाए तो राजधानी को इससे 900 बिलियन लीटर पानी मिल सकता है। यदि सिर्फ छतों पर ही इस पर काम किया जाए तो हर मॉनसून के दौरान औसत 27 मीलियन लीटर पानी मिल सकता है।

बोरवेल को भी करना पड़ेगा बंद
वहीं, रेन वॉटर हार्वेस्टिंग पर काम करने के साथ बोरवेल को बंद करना भी जरूरी है। राजधानी में 19661 अवैध बोरवेल की लिस्ट तैयार करवाई गई थी। इसमें से रेवेन्यू डिपार्टमेंट ने 25 अक्टूबर 2021 तक कुल 11364 बोरवेल को सील किया था। अवैध बोरवेल के लिए डीपीसीसी ने 19661 उद्योगों पर 70.658 करोड़ रुपये का एनवायरमेंटल कंपनसेशन लगाया था। इसमें से उस तिथि तक महज 54.30 लाख ही वसूला जा सका है।

क्या है रेन वॉटर हार्वेस्टिंग की रफ्तार

Delhi rain water harvesting


क्या समस्या है आरडब्ल्यूएच में
– इसे लगाना काफी खर्चीला है। सोसायटी में इसे लगवाने पर 10 से 20 लाख रुपये का न्यूनतम खर्च आता है
– जलभराव वाली जगहों पर चयन कर इसे लगाया जा सकता है, ताकि वह पानी सीधा जमीन में जा सके
– बारिश के पानी को झीलों, तालाबों और जोहड़ों तक पहुंचाने के इंतजाम होने चाहिए ताकि झीलें हर साल रिचार्ज हो सकें
– आरडब्ल्यूएच के रखरखाव के लिए भी मॉनिटरिंग जरूरी है।



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