Bappi lahiri and his music beyond disco


किसी नज़र को तेरा इंतज़ार आज भी है, कहां हो तुम के ये दिल बेक़रार आज भी है.’ साल- 1985, फिल्म- ‘ऐतबार’, गायक- भूपिंदर और आशा भोसले. इन्हीं दो आवाज़ों में इसी फिल्म से अगला गीत, ‘आवाज दी है आज एक नज़र ने, या है ये दिल को ग़ुमां. दोहरा रही हैं जैसे फ़िजाएं, भूली हुई दास्तां.’ गीतकार हसन कमाल के इन लफ़्ज़ों पर संगीत, जानते हैं, किसने धरा है? बप्पी लाहिड़ी (Bappi Lahiri). वही बप्पी लाहिड़ी (Bappi Lahiri), जिनकी भूली हुई दास्तां आज फिर याद दिलाने, दोहराने की अदना कोशिश की जा रही है. वही बप्पी लाहिड़ी (Bappi Lahiri), जिन्हें लोग उनकी ‘डिस्को छवि’ के गिर्द बांधे रखते हैं. वही बप्पी लाहिड़ी (Bappi Lahiri), जिन्हें उनके गले में, हाथों में पहने हुए सोने के गहनों तक गिना जाता है अक्सर. वही बप्पी लाहिड़ी, जिनकी आंखों पर काला चश्मा नज़र आता है लेकिन नजरें उन्हें देखने वालों की धुंधला जाया करती हैं, ज़्यादातर ही.

दायरों में बंधी शख़्सियत का नाम नहीं है बप्पी लाहिड़ी

सच ये है कि बप्पी लाहिड़ी (Bappi Lahiri) दायरे में बंधी किसी शख्सियत का नाम नहीं है. हो नहीं सकता. वरना, क्या मज़ाल कि गीत-संगीत के 50 साल से अधिक के सफ़र में तेजी से बदलती फिल्मी दुनिया में पैर टस से मस न होता, एक बार भी. ये सफर 1969-70 के आसपास से शुरू हो जाता है. बप्पी लाहिड़ी ने अभी उम्र के 12 बसंत भी पार नहीं किए हैं. और लता मंगेशकर उनके संगीत पर गाती हुई सुनाई देती हैं. बांग्ला फिल्म- ‘दादू’, साल- 1969. ये वही लता मंगेशकर हैं, जिनके बारे में कहा जाता है कि संगीत या गीत के बोलों में ज़रा सी भी मीन-मेख उन्हें पसंद नहीं. इसके बाद बमुश्किल 2-3 साल गुजरते हैं और एक हिंदी फिल्म आती है, ‘नन्हा शिकारी. साल-1973. उसमें मुकेश जैसे तब के आलातरीन गायक बप्पी के संगीत पर गाते सुनाई देते हैं, ‘तू ही मेरा चंदा तू ही तारा, तू न हो तो जग में हो अंधियारा.’ यहां से 2 साल और, 1975, फिल्म- ‘ज़ख़्मी’. इसमें किशोर कुमार, मोहम्मद रफी जैसे दिग्गजों के साथ ख़ुद बप्पी लाहिड़ी भी सुनने वालों के कानों तक पहुंचते हैं, ‘नथिंग इज इंपॉसिबिल, कहता हूं मैं सच बिल्कुल.’

पश्चिम सी धुनें और पूरब सी पहचान, एक साथ

बप्पी लाहिड़ी (Bappi Lahiri) अपने ज़माने के दिग्गज संगीतकार सचिन देव बर्मन के बर्मन के तह-ए-दिल से प्रशंसक हैं. साथ ही, उनके बेटे राहुल देव बर्मन के भी. सचिन देव बर्मन ठेठ पूरबिया और लोक धुनों पर आधारित संगीत के सिद्धहस्त. वहीं राहुल देव पश्चिम के साथ पूरब के संगीत के प्रयोगधर्मी. इन दोनों की झलक बप्पी लाहिड़ी में. विशुद्ध शास्त्रीय सी गायकी वाले येशुदास जब गाते हैं, ‘गाओ मेरे मन, चाहे सूरज चमके रे चाहे लगा हो ग्रहन.’ फिल्म- ‘अपने पराए’, साल- 1980. यहां संगीत में एसडी बर्मन का आभास मिलता है. और जब ख़ुद बप्पी लाहिड़ी गाते हैं, ‘बंबई से आया मेरा दोस्त, दोस्त को सलाम करो.’ साल- 1977, फिल्म- ‘आपकी ख़ातिर’. तो तमाम जगहों पर आरडी बर्मन भासते हैं. और 1982 की ‘नमक हलाल’, ख़ास ग़ौरतलब. किशोर कुमार गा रहे हैं, ‘पग घुंघरू बांध मीरा नाची थी.’ वे आलाप लेते हैं. सरगम गाते हैं. साथ में तबला सुनाई देता है और पश्चिम का सिंथेसाइज़र भी. जो एक नए युग की आमद का संकेत भी देता है.

और फिर डिस्को, जो पहचान बन गया 

साल 1982 का ही है, जब एक फिल्म आती है, ‘डिस्को डांसर’. इसमें बप्पी लाहिड़ी (Bappi Lahiri) अपनी अलहदा सी आवाज़ में गाते सुनाई दे रहे हैं, ‘आय एम अ डिस्को डांसर… ज़िंदगी मेरा गाना, मैं किसी का दीवाना.’ और यहां से दुनिया उनके डिस्को की मुरीद हो जाती है. यह डिस्को हमेशा के लिए उनकी पहचान बन जाता है. लकदक सोने से ढंकी उनकी छवि भी इस पहचान को वजन देती है. यहां से इसी पहचान के इर्द-ग़िर्द अनेक शाहकार होते हैं. मसलन- ‘रात बाकी, बात बाकी होना है जो, हो जाने दो.’ फिल्म- नमक हलाल, साल- 1982. इसी फिल्म से ‘कोई यहां अहा नाचे-नाचे, कोई वहां अहा नाचे-नाचे.’ ऐसे ही, ‘जीना भी क्या है जीना, तेरी आंखों के बिना.’ फिल्म- ‘कसम पैदा करने वाले की’ साल- 1984. इतनी दूर से अभी 2020 की ‘बागी-3’ में सुनाई दिए ‘भंकस, एक आंख मारूं, तो पर्दा हट जाए’ तक, बप्पी लाहिड़ी के संगीत-शाहकार का दायरा फैला मिलता है.

लता मंगेशकर ‘मां’ और किशोर कुमार ‘मामा’

इतने विविधतापूर्ण हुनर से भरी शख़्सियत यूं ही नहीं होती. कहते हैं, ऐसी शख़्सियतों को गढ़ने में इर्द-ग़िर्द न जाने कितने लोगों की मेहनत हुआ करती है. मदद हुआ करती है. तो फिर बप्पी लाहिड़ी (Bappi Lahiri) भला इस कहन से अछूते कैसे हो सकते हैं. बंगाल में जलपाईगुड़ी के जिस बिरहमन परिवार में बप्पी जन्मे, वहां मां उनकी बांसुरी कही जाती थीं और पिता- अपारेश. दोनों शास्त्रीयता के सिद्ध गायक और संगीतकार भी. इनकी इकलौती संतान- बप्पी, जिनकी रगों में बांसुरी की धुनें भी समाई दौड़ीं और अपारेश के कंठ से निकला संगीत भी. किशोर कुमार उनके रिश्ते के मामा हुए और लता ताई को उन्होंने ‘मां’ कहा. ऐसी मां जिसने सफर के शुरुआती सालों में ही अपनी संतान के लिए गाया, ‘आओ तुम्हें चांद पे ले जाएं.’ फिल्म- ज़ख़्मी, साल- 1975.

दिल पर हाथ रख सोचिए. क्या उस मां, उस पिता, उस यशोदा और उस मामा ने अपने आलोकेश (Bappi Lahiri) के आलोक को, उसकी प्रखरता को, उसके हुनर को चांद पर ले जाने में कोई क़सर छोड़ी क्या? और क़सर रहती तो हम आज आलोकेश के ही सफ़र से निकलीं लाइनें क्यूं गुनगुना रहे होते?.. ‘चलते-चलते मेरे ये गीत याद रखना, कभी अलविदा न कहना.’

Tags: Bappi Lahiri, Hindi news

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

%d bloggers like this: