अनेकता में एकता का संदेश देते हैं - भगवान शिव
December 26, 2018 • एडिटर अवाज़ेहिंद

अनेकता में एकता का संदेश देते हैं - भगवान शिव
- धर्म - कर्म -

भगवान् सच्चिदानन्द स्वरूप सत्चित्-आनन्द हैं। आप सत् भी हैं।
और चित् भी हैं, लेकिन आनन्द वाले नहीं हैं।
आनन्द पाने के लिए अपने आपको भगवान शिव से जोड़ना होगा।

आशुतोष भगवान शिव भोले भण्डारी हैं और उनके भण्डार सदा सर्वदा आनन्द से भरपूर रहते हैं। हम सब उनके कल्याणकारी स्वरूप की उपासना करते हैं। उनके हाथ में त्रिशूल शोभायमान रहता है। जो शरण में आए हुए मानवों की त्रितापों से रक्षा करता है। त्रिशूल का अर्थ है तीन शल अर्थात वे तीन पीडा, वे तीन दुःख जिनके कारण समूचा जगत संतप्त रहता है। आध्यात्मिक, आधिभौतिक और आधिदैविक इन तीनों दःखों में से कोई न कोई दु:ख तो जीवन में बना ही रहता है। क्योंकि सब कुछ अपने मन का चाहा हुआ नहीं होता। दुःख की घड़ी में सारी परिस्थितियां विपरीत हो जाती हैं। लेकिन जब भगवान शिव की कृपा हो, दया हो, तो दुःखों के शूल भी खुशियों के फूल बन जाते हैं। शिवकृपा से जीवन सुखों से महक उठता है और मन में आनन्द की बहार छाने लगती है। दुःख के समय में मनुष्य के मन का सन्तुलन बिगड़ जाता है।

उसकी अपनी मानसिकता काम नहीं करती। दूसरे के बहकाने से, भड़काने से, दूसरों के द्वारा की गई निन्दा से अथवा झूठी प्रशंसा से व्यक्ति के कदम लड़खड़ा जाते हैं। उसकी विवेक शक्ति कार्य नहीं करती, उन संकट के क्षणों में भक्त को भगवान शिव का ध्यान करना चाहिए, उनके कल्याणकारी स्वरूप का स्मरण करना चाहिए। जैसे त्रितापों के तिरोभाव हेतु भगवान शिव के हाथ में त्रिशूल शोभायमान रहता है। ठीक उसी तरह जीवन में सन्तुलन कायम रखने के लिए उनके डमरू से प्रेरणा प्राप्त होती है। उनके दूसरे हाथ में डमरू है। डमरू का एक मनका दोनों तरफ लगने से डमरू बजता है और तभी डमरू से संगीत की धारा, प्रवाहित होती हैं।

भगवान भोलेनाथ के डमरू का मनका समझाता है कि अपने मन को विपरीत समय में भी सन्तुलित रखें, संजोए रखें, बिखरने न दें, बहकने न दें, तभी आपके जीवन में संगीत उत्पन्न होगा। आनन्द आएगा, शान्ति आएगी, चैन आएगा। संगीत की स्वरलहरियों में स्वर्ग के दर्शन होते हैं और संगीत सन्तुलन से ही उत्पन्न होता है। जिस घर-परिवार में सन्तुलन है, वहां सुख चैन है, वहां सभी हंसते मुस्कराते हुए नजर आते हैं, सभी के मन गाते और गुनगुनाते हैं। एक ही घर आंगन में भिन्नभिन्न आवाज भाव-भावना, और कर्म शीलता होने पर भी सन्तुलन बना रहे, खुशियां बनी रहे, प्रेम बना रहे तो समझना वहां शिव का वास है और वे सभी भगवान शिव के परम उपासक हैं। क्योंकि भगवान शिव अनेकता में एकता का संदेश देते हैं।

उनके परिवार में भिन्नता है लेकिन फिर भी परस्पर ममता है, एकता है और सन्तुलन है। मनुष्य का हृदय भावना प्रधान है और मस्तिष्क तर्क प्रधान है। लेकिन कई बार मनुष्य का मस्तिष्क वह काम नहीं कर पाता, जिसे हृदय की भावनाएं कर जाती हैं। मुसीबतों के भंवर में फंसा हुआ मनुष्य अपनी भाव- भावनाओं की नौका में बैठकर भी पार हो जाता है। इसीलिए अपने हृदय में भगवान शिव के प्रति भक्ति का भाव जगाइए, उसके चरणों में अपना मस्तक झुकाइए, उसकी स्तुति प्रार्थना उपासना, आराधना, अर्चना कीजिए। लेकिन उस विधाता की वन्दना के साथ-साथ उसकी सप्रेरणा भी अमल में लाइए। भगवान शिव के परिवार के सदस्यों में विपरीत धाराएं होने के बाद भी शान्ति और मर्यादा बनी रहती है।

प्रतिकूल स्वभाव वाले होने के बाद भी परस्पर प्रेमभाव बना रहता है, तो आप भी अपने बच्चों के प्रति प्रेम तथा बड़ों के प्रति सम्मान का भाव बनाए रखिए। आपके ऊपर और आपके परिवार के ऊपर भगवान शिव का आशीष बना रहेगा। आपका परिवार भगवान शंकर का परिवार बन जाएगा। भगवान शिव की उपासना देवताओं ने भी पूर्ण मनोयोग से की और राक्षसों ने भी उन्हें अपने भक्ति भाव से प्रसन्न किया। भगवान श्रीराम भी शिव शंकर के उपासक थे और दशानन रावण भी उन्हें श्रद्धा से पूजता था। लेकिन हृदय के भाव जिसके जैसे रहे, उसको वैसा ही फल प्राप्त हुआ। जिनके हृदय में कुटिल भाव होते हैं, उन्हें भगवान शिव के रुद्र रूप का भी सामना करना पड़ता है। जो कि प्रतिकूल होने पर फिर रुलाने में भी कसर नहीं छोड़ता। भोले भाव से भक्ति की तो लंकाधिपति रावण को भगवान भोले नाथ ने प्रसन्न होकर सोने की लंका प्रदान की। लेकिन जब अहंकार से भरा कुटिल स्वभाव देखा तो अमृत के स्रोत को भी सूखने में देर नहीं लगी।

आशुतोष भगवान शिव को मनाने में भी देर नहीं लगती वे शीघ्र ही प्रसन्न हो जाते हैं। बस उनके समक्ष भोले भाव से सच्चे भोले बनकर प्रस्तुत हो जाइए। इसलिए तो उन्हें भोले-भाले कहा जाता है। वे भोले लोगों के लिए भोले बहुत हैं और टेढों के लिए, चालाक लोगों के तीखे भी बहुत हैं। भगवान शिव कृपालु, महाकाल के भी काल, गुणों के धाम परमपिता परमेश्वर हैं। भोलेनाथ शिव के सुन्दर स्वरूप का जितना वर्णन किया जाए उतना ही कम है। भगवान शिव दयालु हैं, सबसे न्यारे हैं।

ऐसा कहा जाता है कि जैसा पिण्ड है वैसा ब्रह्माण्ड है- यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे, यथा ब्रह्माण्डे तथा पिण्डे। जैसा इस ब्रह्माण्ड में है वैसा ही इस पिण्ड में भी है। जो मनुष्य की आत्मा में चेतन तत्व के रूप में है, वही चेतन तत्व भगवान में है। मनुष्य सत् और चित् हो सकता है- लेकिन भगवान् सच्चिदानन्द स्वरूप सत्-चित्- आनन्द हैं। आप सत् भी हैं और चित् भी हैं, लेकिन आनन्द वाले नहीं हैं। आनन्द पाने के लिए अपने आपको भगवान शिव से जोड़ना होगा। भगवान् शिव को त्रिनेत्रधारी कहा जाता है। शिव शंकर को त्रयम्बकम भी कहा जाता है। भगवान शिव के तीन नेत्र हैं। मनुष्य के पास भी भगवान ने तीन नेत्र दिए हैं, लेकिन मनुष्य दो ही नेत्र खुले रखता है। तीसरे का प्रयोग ही नहीं करता।

हां! तीसरे नेत्र की याद दिलाने के लिए हम माथे पर नित्यप्रति तिलक जरूर लगाते हैं और यह समझते हैं कि यहां कुछ है जरूर। वह क्या है? इस पर ध्यान नहीं देते। यहां आपकी प्रज्ञा है। आपकी मेधा है। वह मेधा आपकी प्रज्ञा बने और प्रज्ञा ऋतम्भरा बन जाए जिससे कि आप संसार में रहते हुए कर्त्तव्य कर्म करते हुए अपने लक्ष्य की तरफ बढ़ते चले जाएं। आपको अपना लक्ष्य दिखाई देने लग जाए। आप अपनी आंखों से जितना देखते हैं, उससे कहीं अधिक आप अपनी बुद्धि से देखते हैं। बिना तीसरा नेत्र इस्तेमाल किए आप चल नहीं सकते। इस तीसरे नेत्र को भगवान शिव का ध्यान करते हुए प्रकट कीजिए।

भगवान शिव के माथे पर चन्द्रमा है। चन्द्रमा का अर्थ हुआ शान्ति, शीतलता और सन्तुलन। इससे प्रकट होता है कि भगवान् की आराधना करने के लिए, उसकी शरण में जाने के लिए, मनुष्य को तीन कार्यऐसे करने चाहिए कि उसके मस्तिष्क में शान्ति, शीतलता और सन्तुलन रहे। बुद्धि या मन को हमेशा ही सन्तुलन में रखिए। अपना सन्तुलन मत बिगड़ने दो। यदि आप संतुलित न रहे, शिव का ध्यान आपने नहीं किया, उनके आदेश को, संदेश को और उपदेश को धारण नहीं किया तो संसार एक बार नहीं अनेक बार आपकी तरफ अंगुली करेगा और आप काशीफल के बच्चे की तरह जैसे उसके शिशुरूप में यदि तर्जनी अंगुली दिखा दी जाए, तो कुम्हला जाता है वैसे ही आप मुरझाते रहेंगे। अपनेआप को समर्थ बनाइए, शक्तिशाली बनाइए। हमेशा अपना सन्तुलन कायम रखिए फूलों की तरह हंसते रहिए, मुस्कराते रहिए, भगवान शिव की कृपा से आपका कल्याण होगा। 

- परमपूज्य श्री सुधांशु जी महाराज

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