गुरुबानी व कुर्बानी का पर्व : लोहड़ी
January 13, 2019 • एडिटर अवाज़ेहिंद

- घनश्याम सिंह -
फरवरी, २०१९

पंजाबियों के बारे में एक आम धारणा

हर रंजो गम से दूर रह कर और उससे दो चार - होकर भी मस्ती के लम्हे ढूंढ ही लेते हैं और उसी मस्ती का एक बड़ा नाम है लोहड़ी। नए अनाज के आने की खुशीकी प्रतीक है लोहड़ी का त्यौहार। अपने पिंड के हरे भरे खेत देख कर हर पंजाबी जब झूम के नाचता, गाता है तो समझ लीजिए कि लोहड़ी आ गई है। नई फसल आने की अग्रिम खुशी में पौष महिने के अंतिम दिन, सूर्य के डूबने के बाद बाद मकर संक्रांति से पहली रात 13 जनवरी को पूरा पंजाब ही नहीं बल्कि उत्तर भारत लोहड़ी की मस्ती में डूब नाचता, भंगड़ा, गिद्धा डालता मिलता है । अंग्रेजी में कहें तो एक लोहड़ी एक्रॉस्टिक षब्द है, जिसमें ल (लकड़ी) ओह (गोहा या गोसा या सूखे उपले व ड़ी रेवड़ी को जोड़कर बना है जो लोहड़ी पर बंटने वाले प्रसाद के अभिन्न अंग व लोहड़ी के प्रतीक हैं। इस दिन पूरा उत्तरी भारत कैंप फायर के मूड़ में होता है । गरीब वर्ग के लिए पूस-माघ की कड़कड़ाती सर्दी से बचने के लिए आग सहारा होती है। यही व्यावहारिकता लोहड़ी को मनाने का सबसे बड़ा कारण है।

लोहड़ी से कई गाथाएँ जुड़ी हैं। दक्ष प्रजापति की पुत्री सती के योगाग्नि-दहन की याद में यह अग्नि जलाई जाती है। इस अवसर पर विवाहिता पुत्रियों को माँ के घर से सिंधारा (वस्त्र, मिठाई, रेवड़ी, फलादि भेजे जाते हैं। यज्ञ के समय अपने जामाता शिव का भाग न निकालने का दक्ष प्रजापति का प्रायश्चित्त भी इसमें शामिल है। उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में खिचड़वार और दक्षिण भारत के पोंगल पर भी--बेटियों को भेंट जाती है। लोहड़ी से पहले ही लोहड़ी के लोकगीत गाकर लकड़ी और उपले इकट्ठे करते हैं और इससे चौराहे या मुहल्ले के खुले स्थान पर आग जलाकर लोग अग्नि के चारों ओर आसन जमा लेते हैं। घर के कामकाज से निपटकर हर परिवार अग्नि की परिक्रमा करता है। तिल की रेवड़ी और मक्की के भुने दाने जिन्हे फुल्ली भी कहा जाता है अग्नि की भेंट किए जाते हैं तथा ये इन चीजो को प्रसाद के रूप में भी वितरित किया जाता हैं। घर लौटते समय लोहड़ी में से दो चार दहकते कोयले, प्रसाद के रूप में, घर पर लाने की प्रथा भी है।

जिन घर - परिवारों में लडके की शादी होती है अथवा जिन्हें पुत्र प्राप्ति होती है, उनसे पैसे लेकर मुहल्ले या गाँव भर में बच्चे ही बराबर बराबर रेवड़ी बाँटते हैं। लोहड़ी के दिन या उससे दो- चार दिन पूर्व बच्चे बाजारों में दुकानदारों तथा राहगीरों से हामाई (लोहड़ी का ही दूसरा नाम) के पैसे माँगते हैं, इनसे लकड़ी एवं रेवड़ी खरीदकर सामूहिक लोहड़ी में डालते हैं। यं तो लोहड़ी का त्यौहार मुख्यतः पंजाबियों का प्रमख त्यौहार माना जाता है। पर अब यह पंजाब व हरियाणा की सीमाओं से बाहर निकल उत्तरप्रदेश, उत्तराखंड दिल्ली, जम्मू कश्मीर और हिमाचल सहित हर उस राज्य में पहुंच गया है जहां पंजाबी रहते हैं । लोहड़ी का नायक दुल्ला भट्टी है जो एक विद्रोही था और उसके वंशज भटटी राजपत थे और पिंडी भट्टियों के शासक थे जो संदल बार पकिस्तान में स्थित था। कुछ लोग कहते हैं कि दुल्ला भट्टी मुग़ल शासक अकबर के समय में पंजाब में रहता था। उसे पंजाब के नायक की उपाधि से सम्मानित किया गया था! उस समय संदल बार नाम के स्थान पर लड़कियों लड़कों को गुलामी के लिए बल पूर्वक अमीर लोगों को बेच जाता था जिसे दुल्ला भट्टी ने एक योजना के तहत लड़कियों को मुक्त ही नहीं करवाया अपितु उनकी शादी हिन्दू लडको से करवाई और उनके शादी के सभी व्यवस्था भी करवाई लोहड़ी पर उसके इसी ज़ज्बे की प्रशंसा में गीत गाए जाते हैं - इस अवसर पर गाया जाने वाला ‘दुल्ला भट्टी सुंदर-मुंदरिए, तेरा की विचारा' वाला गीत सबसे लोकप्रिय गीत है । इस गीत का एक अंशदेखिए : सुंदर मुंदरिए हो, तेरा कौन विचारा-हो दुल्ला भट्टी वालाहोदुल्ले ने धी ब्याहीहो सेर शक्कर पाईहोकुडी दे बोहो पाईहो कुड़ी दा लाल पटाकाहोकुड़ी दा शालू पाटाहो ।

यह गीत दुल्ला भट्टी वाले का यशोगान करता है, जिसने दो अनाथ कन्याओं, सुंदरी-मुंदरी की जबरन होने वाली शादी को रुकवाकर व उनकी जान बचाकर उनकी जंगल में आग जलाकर और कन्यादान के रुप में एक सेर शक्कर देकर शादी की थी। लड़कों की टोलियां अक्सर यह गीत गाकर लोहड़ी माँगती हैं और यदि कोई लोहड़ी देने में आनाकानी करता है तो फिर ये बच्चे उनकी ठिठोली भी करने से बाज नहीं आते और गा - गा कर कहते हैं: 'हुक्के उत्ते हुक्का ए घर भुक्का!' लड़कियां भी कम नहीं वे भी अपने गीत गाकर लोहड़ी मांगती हैं। समय के बदलते रंग के साथ कई पुरानी रस्में और त्योहारों पीछे छूट रही हैं या उनका आधुनिकीकरण हो गया है, लोहड़ी पर भी इसका प्रभाव पड़ा है अब गाँव में लड़के-लड़कियाँ लोहड़ी माँगते हुए किसी चौराहे पर ही डीजे पर फिल्मी गीतों पर धमाल मचाते दिखते हैं । ऐसा होना बहुत स्वाभाविक भी है पर अगर हमारी परंपराएं यूं ही मरती ढहती गई तो फिर लोहड़ी जैसे पर्व की मौलिकता व मस्ती भी खत्म हो जाएगी या उस पर भदेसपना हावी हो जाएगा।

मगर इससे भी बड़ी चिंता की वजह है कि शरारती तत्व दुसरे मुहल्लों में जाकर लोहड़ी से जलती हुई लकड़ी उठाकर अपने मुहल्ले की लोहड़ी में डाल देते हैं। यह 'लोहड़ी ब्याहना' कहलाता है। पर कई बार इस छीना झपटी में लड़ाई भी हो जाती है। लकड़ी और उपलों के अभाव में दूसरों की लकड़ी की चीजें उठाकर जला देने की शरारतें भी चल पड़ी हैं।

पंजाब के ऊपर लगते नशेखोरी के आरोप की छाया लोहड़ी पर भी पडी है और त्यौहार की मस्ती के नाम पर जमकर ड्रग्स व शराब के साथ ही अफीम व चरस आदि का सेवन न केवल लोगों का स्वास्थ्य खराब कर कर रहा है अपितु लोहड़ी के रंग भी फीके कर रहा है। उससे लोहड़ी को बचाने के लिए बहुत कुछ करना होगा।