Tuesday, June 28, 2022
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भाग्यश्री के बेटे ‘निकम्मा’ ऐक्टर अभिमन्यु दासानी का छलका दर्द, कहा- मेरी मेहनत पर नेपोटिजम थोप दिया गया- Nikamma actor Abhimanyu Dassani opened up about nepotism

फिल्म ‘मर्द को दर्द नहीं होता’ से बॉलिवुड में डेब्यू करने वाले अभिमन्यु दासानी की पहचान कई बार ‘मैंने प्यार किया’ फेम ऐक्ट्रेस भाग्यश्री के बेटे के रूप में ही की जाती है। उनके लिए स्टार किड और नेपोटिज्म का प्रॉडक्ट होने जैसी बातें भी कही गईं। जबकि, अभिमन्यु के मुताबिक, उन्हें कभी किसी का बेटा होने का कोई फायदा नहीं मिला, उल्टे खामियाजा ही उठाना पड़ा। पढ़िए, फिल्म निकम्मा में नजर आने वाले अभिमन्यु से ये खास बातचीत

‘निकम्मा’ कोई भी इंसान खुद को कहलाना नहीं चाहेगा। आप बचपन में कैसे थे, सुलझे हुए थे या काम करवाने के लिए धक्का मारना पड़ता था?
कोई कहलाना चाहे या न चाहे, घर में किसी न किसी ने हर किसी को कभी तो निकम्मा या इससे मिलता-जुलता शब्द कहा ही होगा। निकम्मा एक फीलिंग है। जहां तक मेरी बात है, तो मुझे सिर्फ इस बात के लिए कंट्रोल करना पड़ता था कि बेटा कम खाओ। मैं किसी के घर जाता था, तो लोग डर जाते थे कि मैं खाना खत्म कर दूंगा। पहली बार मेरी मां ने मुझे इसलिए मारा था, क्योंकि मैंने बहुत खा लिया था। वरना पढाई में मैं एवरेज से बेहतर था। मैंने फाइनैंस में मेजर किया। एक्स्ट्रा करिकुलर ऐक्टिविटीज में मैं बहुत ऐक्टिव था। मैं शरारती था, पर सबका सम्मान करता था क्योंकि मेरी मां से मुझे वो संस्कार दिए थे। मैं मस्ती करता था पर स्कूल टीचर अब भी याद करते थे। स्कूल का कैंटीन वाला अब भी मुझे घर पर बड़ा पाव भेजता है। उससे बीस साल से मेरी बहुत अच्छी दोस्ती रही है।


आप खाने को लेकर जितने शौकीन हैं, ऐक्टर बनने के बाद तो फिट दिखने के लिए आपको बहुत बड़ी कुर्बानी देनी पड़ी होगी?
असल में क्या हुआ कि 10वीं के बाद मैं बहुत ही तगड़ा हो गया था। तब एक एथलीट थी, मुझसे जूनियर और उससे मुझे वो (प्यार) हो गया, जो होता है। फिर तो मैंने कहा कि भई अब एथलीट तो बनना पड़ेगा, तो एक गर्मी की छुट्टियों में मैंने अपना सारा वजन कम कर लिया। 11वीं के दौरान मेरे ऐब्स आ चुके थे। मैं स्कूल का बेस्ट एथलीट बना। मैंने स्टेट लेवल फुटबॉल खेला, हैंडबॉल खेला, अवॉर्ड मिले और वो मेरा पहला रिलेशनशिप था, तो मैं उसका शुक्रगुजार हूं।


आपने फाइनैंस की पढ़ाई की है। आपके डैड बिजनेसमैन हैं, तो आपके पास बिजनेस का भी ऑप्शन था, तो ऐक्टिंग क्यों चुनी?
दरअसल, मैंने 15 साल की उम्र में काम करना शुरू कर दिया था। मैंने बहुत सारे अलग तरह के काम किए। मैं सीरियल आंत्रप्रन्योर था, जो भी मौके मिलते थे, मैं उस पर कूद जाता था। ऐसे ही एक मौका जो मिला, वो था असिस्टेंट डायरेक्टर बनने का। रोहन सिप्पी सर जब दम मारो दम बना रहे थे, मैंने उसने पूछा कि क्या मैं आपके साथ काम कर सकता हूं, तो उन्होंने कहा कि इंटर्न बन सकते हो। ऐसे, फिल्मों से जुड़ाव हुआ। वरना मैंने ऐक्टर बनने का कभी नहीं सोचा था। मैं इंडस्ट्री से एकदम दूर ही रहा था। मेरी पहली फिल्म आने तक कोई मुझे जानता नहीं था। मैं न तो इंडस्ट्री का हिस्सा था, न मुझे ये पता था कि इंडस्ट्री काम कैसे करती है। हां, ये था कि मेरी मां कभी ऐक्टर थीं लेकिन आप लोगों ने मिलकर बेवजह मेरे ऊपर वो एन (नेपोटिज्म) शब्द थोप दिया और मुझे सारा नेगेटिव मिल गया। मुझे उसका फायदा तो जीरो मिला लेकिन इस एन वर्ड के चलते दिक्कतें सारी झेलनी पड़ी। मैं 2009 से इंडस्ट्री में हूं, लेकिन लोग बोलते हैं कि रातोंरात सफलता मिल गई। जब मेरी पहली फिल्म आई थी, तब तो किसी ने ट्वीट नहीं किया, किसी ने इंटरव्यू नहीं किया, उसको इंटरनैशनल अवॉर्ड मिला तब भी किसी ने नहीं लिखा। बस आकर पूछते हैं कि आपके लिए तो आसान रहा न।


क्या आपके हिसाब से इंडस्ट्री में नेपोटिजम नहीं चलता? किसी का बेटा या भाई होने से यहां फायदा नहीं मिलता?
मैं किसी और के बारे में बात नहीं कर सकता। मेरे केस में मुझे किसी का बेटा होने का कोई फायदा नहीं मिला। मैंने डेढ़ महीने ऑडिशन दिया था, मर्द को दर्द नहीं होता के लिए। 2015 में वो फिल्म साइन की, 2019 में फिल्म आई। 2018 में निकम्मा साइन की थी, ये 2022 में आ रही है। बताइए मेरे लिए आसान था? अभी भी मैं इंटरव्यू के लिए जाता हूं, लोग मेरा नाम गलत बोलते हैं, अभिषेक, अभिनव, कुछ भी, लेकिन ये साइड कोई देखना ही नहीं चाहता, क्योंकि आपके दिमाग में एक स्टोरी बना दी गई है। खैर, मेरा मानना है कि मेरा काम मेरे लिए बोलेगा। मेरी हर फिल्म दूसरे से अलग है। आपको उसमें मेरी मेहनत दिखेगी। मेरा काम है पूरी ईमानदारी से मेहनत करना और वो मैं कर रहा हूं।

‘निकम्मा’ के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ी?
बहुत कुछ किया। मैंने सात किलो बढ़ाए थे इस फिल्म के लिए। इसके लिए अपनी आवाज बदली। ये मेरी पिछली फिल्म मीनाक्षी सुंदरेश्वर से कितनी अलग है, वो आपको मेरे अंदाज और लहजे से समझ में आ जाएगा। मैंने गोविंदा सर की बहुत सारी पिक्चरें देखीं, क्योंकि वो हमारे देश के बेस्ट कमर्शल हीरो हैं। चूंकि, मैं एक अलग दुनिया से आता हूं और हमारे डायरेक्टर साबिर सर कमर्शल सिनेमा से आते हैं, तो हमने साथ में बहुत वर्कशॉप की।

‘निकम्मा’ साउथ इंडियन फिल्म की रीमेक है। इधर जिस तरह से रीमेक का चलन बढ़ा है, आपकी उस पर क्या राय है? फिर अब लोग ओटीटी पर ओरिजिनल फिल्म देख लेते हैं, ऐसे में रीमेक क्यों देखें?

आप अच्छा रीमेक बनाओ न। हर ऐक्टर, हर डायरेक्टर एक ही चीज को बहुत अलग तरह से देखता है। अगर कोई और उसी फिल्म में वही किरदार निभाता है तो अलग फिल्म बनती है। उसका फ्लेवर अलग होता और हमने ये फिल्म काफी बदली है। जहां तक रीमेक के ट्रेंड की बात है, बेशक ओरिजिनल पर काम ज्यादा होना चाहिए, पर अगर कहीं कोई स्टोरी किसी ने बनाई है, जिसे आपको अलग ऑडियंस को दिखानी है तो आप उनके फ्लेवर में, उनकी भाषा में बनाएंगे, इसमें गलत क्या है। क्यों दूसरी ऑडियंस को एक ऐसी फिल्म देखने का मौका ना मिले, जो उन्होंने देखी नहीं है? अगर आप ईमानदारी से कोई अच्छी फिल्म बना रहे हैं। आप उसे चुरा नहीं रहे हैं, तो किसी को क्या दिक्कत है। बस ये है कि अभी ये हॉट टॉपिक है तो हर कोई इसके बारे में बात कर रहा है, तीन महीने बाद नहीं करेंगे।

अभी आपकी मम्मी ने भी स्क्रीन पर कमबैक किया है, तो अब घर में मम्मी, आप और बहन तीन ऐक्टर्स हो गए। ऐसे में, फिल्मों की कितनी बातें होती हैं? फिर मम्मी तो हमेशा आपके सपोर्ट में दिखती हैं, आप उन्हें कैसे सपोर्ट करते हैं?
वो हमारी मां हैं, तो हमेशा बढ़ावा देंगी ही, लेकिन हमारी फीलिंग काफी म्यूचुअल है। मैंने और मेरी बहन ने ही मां को वापस सिनेमा में लौटने के लिए प्रोत्साहित किया। बाकी, मेरे घर में सभी अपने फैसले खुद लेते हैं। बाद में एक-दूसरे से शेयर करते हैं और सपोर्ट करते हैं, जैसे कोई भी परिवार करता है।





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