क्यों और कब मनाया जाता है सफला एकादशी का पर्व, जानिये व्रत कथा


महात्मा के इस व्यवहार से लुम्पक की बुद्धि में परिवर्तन आ गया। वह सोचने लगा, ”यह कितना अच्छा मनुष्य है। मैं तो इसके घर चोरी करने आया था, पर इसने मेरा सत्कार किया। मैं भी तो मनुष्य हूँ, मगर कितना दुराचारी तथा पापी हूँ।”

पौष कृष्ण एकादशी को सफला एकादशी कहते हैं। इस एकादशी को भगवान नारायणजी की पूजा का विधान है। इस दिन अगर, नारियल, सुपारी, आंवला, अनार तथा लौंग आदि से श्री नारायणजी का विधिवत पूजन करना चाहिए। इस दिन दीप-दान तथा रात्रि जागरण का बड़ा महत्व है।

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व्रत कथा

राजा महिष्मन के चार बेटे थे। सबसे छोटा बेटा लुम्पक बहुत दुष्ट तथा पापी था। वह राज्य के धन को अनाप-शनाप खर्च करता था। राजा ने उसे कई बार समझाया लेकिन वह नहीं माना। जब उसके कुकर्म हद से ज्यादा बढ़ गये तो राजा ने दुखी होकर उसे अपने राज्य से निकाल दिया। जंगलों में भटकते हुए भी उसने अपनी पुरानी आदतें नहीं छोड़ीं। एक बार लूटमार के दौरान लुम्पक को तीन दिन तक भूखा रहना पड़ा। भूख से परेशान होकर उसने एक साधु की कुटिया में चोरी का प्रयास किया। परन्तु उस दिन सफला एकादशी होने के कारण उसे वहां कुछ भी खाने को नहीं मिल सका और वह महात्मा की नजरों से भी नहीं बच सका। अपने तप से महात्मा ने सब कुछ समझ लिया। इसके बावजूद उसे वस्त्रादि दिये और मीठी वाणी से सत्कार किया।

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महात्मा के इस व्यवहार से लुम्पक की बुद्धि में परिवर्तन आ गया। वह सोचने लगा, ”यह कितना अच्छा मनुष्य है। मैं तो इसके घर चोरी करने आया था, पर इसने मेरा सत्कार किया। मैं भी तो मनुष्य हूँ, मगर कितना दुराचारी तथा पापी हूँ।” उसे अपनी भूल का अहसास हो गया। वह क्षमायाचना करता हुआ साधु के चरणों पर गिर पड़ा तथा उन्हें स्वयं ही सब कुछ सच-सच बता दिया। तब साधु के आदेश से लुम्पक वहं रहने लगा। वह साधु द्वारा लाई हुई भिक्षा से जीवन यापन करता। धीरे-धीरे उसके चरित्र के सारे दोष दूर हो गये। वह महात्मा की आज्ञा से एकादशी का व्रत भी करने लगा। जब वह बिल्कुल बदल गया तो महात्मा ने उसके सामने अपना असली रूप प्रकट किया।

महात्मा के वेश में वह महाराज महिष्मन ही थे। पुत्र को सद्गुणों से युक्त देखकर वे उसे राज भवन ले आये और उसे राज-काज सौंप दिया। प्रजा उसके चरित्र में परिवर्तन देखकर हैरान रह गयी। उसने सारा राज-काज संभाल कर आदर्श प्रस्तुत किया। लुम्पक आजीवन सफला एकादशी का व्रत तथा प्रचार करता रहा। इससे यह बात स्पष्ट होती है कि व्यक्ति पर संगति का बड़ा प्रभाव पड़ता है। दुष्टों की संगति ने उसे दुष्ट बना दिया था लेकिन महात्मा की संगति के कारण वह महात्मा बन गया।

-शुभा दुबे

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